यूपी में भी हाथ मिला सकते हैं माया-ओवैसी

बिहार विधान सभा चुनाव नतीजों ने उत्तर प्रदेश की सियासत में भी गरमी पैदा कर दी है। खासकर उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटरों के सबसे बड़े ‘ठेकेदार’ समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव की नींद उड़ी हुई है। मुस्लिम वोटों के लिए हाथ-पैर मार रही कांगे्रस की उम्मीदों को भी ग्रहण लगता दिख रहा है। चिंता का कारण बिहार विधान सभा चुनाव में पांच सीटें जीत कर सबको चैका देने वाली ओवैसी की ‘आॅल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन’(एआईएमआईएम) पार्टी बनी हुई है। बिहार विधान सभा चुनाव में एआईएमआईएम का प्रदर्शन काफी चैकाने वाला रहा, जिस तरह से मुस्लिम वोटरों ने असुद्दीन ओवैसी की पार्टी पर विश्वास जताया उससे एक तरफ राष्ट्रीय जनता दल के युवा नेता तेजस्वी यादव का सत्ता हासिल करने का सपना चकनाचूर हो गया तो दूसरी तरफ बिहार के नतीजों ने उत्तर प्रदेश में भी ओवैसी का पंख फेलाने का मौका दे दिया। ओवैसी ने बिहार में भले ही पांच सीटें जीती हों,लेकिन उसका असर अभी से यूपी में महसूस किया जाने लगा है। ओवैसी की पार्टी बिहार की जीत का जश्न यूपी में भी मना रही है।

बात इससे आगे की कि जाए तो इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि बिहार मेें मिलकर विधान सभा चुनाव लड़ने वाली मायावती-ओवैसी की पार्टी 2022 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भी साथ-साथ नजर आएं। ओवैसी की पार्टी ने बिहार के सीमांचल क्षेत्र की पांच सीटों में जीत दर्ज कर अपनी मजबूती का प्रदर्शन किया है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार बिहार में 1.24 फीसदी वोट एआईएमआईएम को मिले हैं। बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा था और उसे सिर्फ 0.5 फीसदी मत ही हासिल हो पाया था. ओवैसी ने सीमांचल के अलावा कोसी और मिथिलांचल में भी अपना प्रभाव छोड़ा है.

ओवैसी की पार्टी आरजेडी के माय (मुस्लिम-यादव) समीकरण में भी बड़ी सेंधमारी की हैं। सीमांचल की राजनीति को जानने वाले वाले कहते हैं कि इस चुनाव में पहली बार ओवैसी की पार्टी ने अमौर, वायसी, जोकीहाट, बहादुरगंज और कोचाधामन सीट पर जीत हासिल की है। इससे पहले उपचुनाव में पार्टी ने किशनगंज की सीट जीतकर बिहार में अपना खाता खोला था। ऐसा नहीं कि मुस्लिम आबादी बहुल इस इलाके में एआईएमआईएम पहली बार चुनावी मैदान में उतरी थी, लेकिन अन्य चुनावों में इसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। इस चुनाव में पार्टी ने भले ही पांच सीटें जीती हैं, लेकिन शेष जगहों पर इसने महागठबंधन के प्रत्याशियों के लिए परेशानी बढ़ा दी। बिहार  में ओवैसी की पाटी 20 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, इनमें से ज्यादातर पर सात नवंबर को मतदान हुआ था। बिहार में ओवैसी की पार्टी  ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट का हिस्सा थी,जिसमें उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी शामिल थे। इसीलिए यूपी में भी ओवैसी-माया के हाथ मिलाने की चर्चा हो रही है। यहां एक और कारण की चर्चा भी जरूरी है, जब बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती सपा प्रमुख अखिलेश से बुरी तरह से नाराज हो गईं थीं। नाराजगी का आलम यह था कि पिछले दिनों उन्होंने यहां तक कह दिया था कि समाजवादी पार्टी को हराने के लिए अगर जरूरत पड़ी तो उनकी पार्टी बीजेपी का भी समर्थन कर सकती है। हालांकि बाद में मायावती अपने बयान से पलट गई थीं।

दरअसल,बीएसपी के कुछ विधायकों के समाजवादी पार्टी से मिल जाने के बाद मायावती ने उत्तर प्रदेश में होने वाले विधान परिषद चुनाव के संदर्भ में हाल में अपना एक वीडियो बयान जारी किया था,जिसमें उनका कहना था,‘जब यहां एमएलसी के चुनाव होंगे तो सपा के दूसरे उम्मीदवार को हराने के लिए बसपा अपनी पूरी ताकत लगा देगी और इसके लिए चाहे पार्टी के विधायकों को इनके (सपा) उम्मीदवार को हराने के लिए बीजेपी या अन्य किसी भी विरोधी पार्टी के उम्मीदवार को अपना वोट क्यों न देना पड़ जाए, तो भी देंगे।’ अगर ओवैसी-माया साथ आते हैं तोे समाजवादी पार्टी के लिए मुस्लिम वोट बैंक को साधे रखना मुश्किल हो जाएगा। यूपी में करीब 18 प्रतिशत आबादी मुस्लिमों और 23 प्रतिशत आबादी दलितों की है। अगर दलित और मुस्लिम एक झंडे के नीचे आ गए तो भाजपा-समाजवादी पार्टी और कांगे्रस सबका खेल बिगड़ सकता है। क्योंकि वोट कटवा कही जाने एआईएमआईएम ने बिहार विधानसभा चुनाव में पांच सीटों पर जीत का परचम लहराने के बाद यह साबित कर दिया है कि अब उसकी पहचान सिर्फ वोटकटवा पार्टी तक सीमिति नहीं रखी जाए। वैसे, करीब 18 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले यूपी पर ओवैसी की नजर काफी पहले से है, लेकिन वह यहां अभी तक जड़े नहीं जमा पाई है। बिहार में मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर शानदार प्रदर्शन के बाद ओवैसी यूपी में अपनी सक्रियता बढ़ाने जा रही हैं।

बात समाजवादी पार्टी के साथ लम्बे समय से साथ खड़े मुस्लिम वोटरों की कि जाए तो पिछले कुछ वर्षो में मुस्लिम वोटरों का समाजवादी पार्टी के प्रति विश्वास कई बार डगमगाया है। मुस्लिम वोटरों को अखिलेश में वह बात नहीं दिखती है जो मुलायम सिंह में थी। मुलायम सिंह यादव जब तक सक्रिय रहे, वे मुस्लिम धार्मिक नेताओं से मुलाकात का नियमित सिलसिला बनाए रखते थे, यह सिलसिला कुछ समय तक अखिलेश राज में भी चला, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा को करारी हार मिलने के बाद अखिलेश यादव ने अपनी सियासत का रूख काफी हद तक मोड लिया था। वह मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए हिन्दुओं की नाराजगी मोल लेने से बचने लगे थे,लेकिन बिहार विधान सभा चुनाव के नतीजों के बाद काफी कुछ बदल गया है। इसीलिए ओवैसी यूपी में अपनी ताकत दिखाना शुरू करें इससे पहले ही समाजवादी पार्टी मुस्लिमों को रिझाने के लिए मैदान में कूदने की तैयारी कर रही है। इस क्रम में अखिलेश यादव सबसे पहले जेल में बंद आजम खान की रिहाई के लिए आंदोलन शुरू कर सकते है। अखिलेश अपनी पार्टी और स्वयं को आजम के साथ खड़ा दिखाकर मुसलमानों में यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि वह ही मुसलमानों की सबसे बड़ी हितैषी है।