किसान आंदोलन’ की अनदेखी ,सबको भारी पड़ेगी !

हांसिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस और जातियता के आधार पर बने क्षेत्रीय राजनैतिक दलों के अगुआकार जो इस समय विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं वो सबके सब ‘किसान-आंदोलन’ पर शांत क्यों बैठे हैं ? देश के आम लोगों को भले ही इस बात का रहस्य न पता हो, परंतु ज्यादातर लोगों को अब यह बात धीरे-धीरे पता चल गई है ! सभी दलों ने बारी-बारी से देश के लोगों की गाढ़ी कमाई से प्रदेश व देश का विकास करवाने के बजाय अपना व अपने परिवार का विकास करते हुए भृष्टाचार की सीमाएं तोड़ रखी है। अपवाद स्वरूप एकाध नेताओं को छोंड़ दिया जाए तो देश में शायद ही कोई ऐसा नेता होगा जिसकी संपत्ति देखते ही देखते करोड़ों में न पहुंच गई हो ? संयोग से वही सब आज विपक्ष में हैं ! इसी कमजोरी का फ़ायदा उठाते हुए सरकार और सत्तारुढ़ दल के नेता मनमानी करने पर उतारु हैं। वो कुछ भी कर सकते हैं ! किसी को भी देशद्रोही बता सकते हैं और देश के किसी भी संगठन को आतंकी संगठन घोषित कर सकते है ! जो देशहित में कतई नहीं है ! लेकिन पता नहीं सरकार किस अंहकार में है जो देश के अन्नदाता को भी आतंकी बनाने पर तुली है।
लगता है सरकार ने भृष्टाचार में डूबे विपक्ष के सभी नेताओं के पीछे केंद्रीय जांच एजेंसियों को लगा रखा है ऐसे में जो भी राजनैतिक दल ‘किसान-आंदोलन’ के पक्ष में सड़क पर उतरने का प्रयास करेगा उस दल के अगुआकर को ‘तिहाड़-जेल’ की हवा खिला दी जायेगी। शायद यही वजह है कि पिछले 10 दिन से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सीमा पर डेरा जमाये देश के किसानों के कन्धों पर हाँथ रखने की किसी भी राजनैतिक दल ने ज़हमत नहीं उठाई है। बहुमत के अंहकार में आकर केंद्र सरकार ने जिस अंदाज में किसानों से वगैर वार्ता किये दो माह पहले किसान कानून संशोधन करके तीन नए कानून लागू किये हैं ! उससे साफ़ है कि सरकार की नियति ठीक नहीं है। उन कानूनों की बानगी देश भर का किसान धान की फसल में देख भी चुका है। इसी के चलते किसानों ने कानून में संशोधन करते हुए फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य व मंडियों को खत्म न करने की गारंटी के लिए नोटिफ़िकेशन जारी करने की मांग को लेकर दिल्ली को घेर रखा है। यह बात अलग है कि इन किसानों में हरियाणा और पंजाब के किसानों की संख्या सर्वाधिक है जिसकी मुख्य वजह यह है कि देश के इन्ही दो प्रदेशों में धान की सर्वाधिक पैदावार होती है और इन्ही प्रदेशों के किसानों के पास ज्यादा जोत की खेती भी है। इसी वजह से आंदोलन में देश भर के किसान नेता शामिल हैं ! लेकिन विपक्षी दलों के नेताओं की तरह ही देश की ‘दलाल मीडिया’ पर भी सरकार ने अघोषित कर्फ़्यू लगाकर किसानों के आंदोलन को दबा रखा है। जिसके चलते किसानों की समस्याओं पर डिबेट होने के बजाय अधिकांश टीवी चैनलों व समाचार पत्रों के सम्पादकीय कालमों में असली और नकली किसानों पर मंथन हो रहा है। जबकि हकीकत यह है कि सरकार द्वारा बनाये गए तीनों कानूनों से जमाख़ोरों और कालाबाज़ारी को आजादी मिलेगी ! क्योंकि नए विधेयक से यह स्पष्ट नहीं है कि किसानों की उपज की खरीद कैसे सुनिश्चित होगी ? नए कानूनों से जो व्यवस्था बनेगी उसमें दिक्कत ये है कि उसमें इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि मंडियों के समाप्त होने के बाद बड़े व्यवसायी मनमाने दामों पर कृषि उत्पादों की खरीद नहीं करेंगे। किसानों का मानना है कि सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य को बाध्यकारी और उसके उल्लंघन को कानूनी अपराध घोषित करना चाहिए था और यही किसानों की मुख्य मांग है ! लेकिन पता नहीं सरकार उनकी बात को सुनने की जगह बेवज़ह प्रोपेगैंडा फैलाने में क्यों लगी हुई है।
जानकारों की मानें तो ये कृषि कानून स्पष्ट तौर पर किसानों के विरोध में और बड़े व्यावसायिक घरानों के पक्ष में हैं। चूंकि सरकार के पास पुलिस बल की ताकत ही नहीं तमाम तरह के हथकंडे भी है ! इसलिये सम्भव है कि सरकार लाठी और गोली चलवाकर किसानों के आंदोलन को नस्त-नाबूद कर दे ! लेकिन उस बर्बादी का क्या होगा जो इन कानूनों से संभावित है ? सबसे खास बात तो यह है कि सरकार अपनी जनता की बात सुनने की जगह जनता से ही भिड़ने का तानाबाना क्यों बन रही हैं ? चिंतनीय विषय तो यह है कि देश का मीडिया इस मुद्दे पर कतई बहस नहीं कर रहा कि आखिर सरकार किसान विरोधी कानून लाई ही क्यों है ? देश का मीडिया इस बात पर भी बहस नहीं कर रहा कि सरकार किसानों के संसाधन छीनकर उन्हें पूंजीपतियों का गुलाम क्यों बनाना चाहती है ? देश का मीडिया प्रोपेगैंडा पर बहस करता है कि किसानों को कुछ लोग ‘भड़का’ रहें है। क्या मीडिया ने ईमानदारी से ये बताने की कोशिश की है कि किसान संगठनों के विरोध के तमाम कारण जायज हैं और उन पर सरकार को विचार करना चाहिए। क्यों सरकार पिछले 10 दिन में 5 बार किसानों से वार्ता करने के बाद भी समस्या का हल नहीं निकाल पा रही है ? क्यों सरकार मंडी समितियों व न्यूनतम समर्थन मूल्य को खत्म न करने के लगातार आश्वासन दे रही है ? चूंकि नए कानून मंडी सिस्टम व न्यूनतम समर्थन मूल्य को खत्म करने के साथ ही कॉरपोरेट ठेका खेती को बढ़ावा देने वाले हैं ! जिससे किसानों का नुकसान होना तय है। इसके साथ ही नये कानून से मंडी समितियों के निजीकरण होने की भी सम्भावना है। नया कानून ठेके पर खेती करने की बात कहता है इस लिहाज से जो कंपनी या व्यक्ति ठेके पर कृषि उत्पाद लेगा उसे प्राकृतिक आपदा या कृषि फसल में होने वाले नुक़सान से कोई लेना देना नहीं होगा। ऐसे में नुकसान सिर्फ किसान को ही उठाना पड़ेगा। अभी तक किसानों पर खाद्य सामग्री जमा करने पर कोई पाबंदी नहीं थी। ये पाबंदी सिर्फ़ व्यावसायिक कंपनियों पर ही थी। लेकिन अब जमाख़ोरी रोकने की कोई व्यवस्था नहीं रह जाएगी जिससे बड़े पूंजीपतियों को तो फ़ायदा होगा लेकिन किसानों को नुक़सान झेलना पड़ेगा। इस तरह आने वाले समय में किसानों के लिए नया कानून फांसी का फंदा बनने वाला है जिसमें सुधार होना ही चाहिए क्योंकि यह किसान हित में है और यही देशहित में भी है।