किसान करें पान की खेती जानें औषधीय महत्व

श्रेणी : औषधीय, समूह : कृषि योग्य, वनस्पति का प्रकार : लता, वैज्ञानिक नाम : पीपर बेतले, सामान्य नाम : पान

पौधे की जानकारी

उपयोग : पान की पत्तियों का उपयोग परंपरागत रोगो के उपचार, पेट की बीमारियों और संक्रमण के उपचार में किया जाता है। पान के पत्तों में प्रतिरक्षा के गुण को बढ़ाने के साथ – साथ कैंसर विरोधी गुण पाये जाते है। यह मुंह विकार और अपच के उपचार में उपयोग किया जाता हैं। यह गले से संबंधित समस्याओं और सांस की समस्याओं में भी मद्दगार होता है। यह हृदय और हृदय प्रणाली को मजबूत शक्ति प्रदान करता है। कई परंपरागत हिन्दू समारोहों में पान का उपयोग किया जाता है।

उत्पति और वितरण: यह मूल रूप से भारत का पौधा है। संपूर्ण भारत में इसकी खेती की जाती है। भारत में यह बिहार, बंगाल, ओडि़शा, दक्षिण भारत और कर्नाटक में पाया जाता है। यह श्रीलंका में भी पाया जाता है। मध्य प्रदेश में यह सागर, टीकमगढ़ और छतरपुर जिलों में पाया जाता है।

वितरण : पान एक सदाबहार व्यापक रूप से बढऩे वाली लता है। इसका वाणिज्यिक उत्पाद पत्तियां है जो मुख्य रूप से सुपारी, बुझे चूने, तंबाकू और कुछ अन्य साम्रगी के साथ चबाने के लिए उपयोग की जाती है। पान चबाने की आदत 340 ई.पू. पुरानी है। और उस समय पान एक प्रतिष्ठित देश के प्रतिष्ठित समाज के द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तु थी। वर्तमान में पान स्थानीय खपत और निर्यात के लिए पैदा किया जा रहा है। पान के प्रमुख उत्पादक देश भारत, श्रीलंका, थाईलैंड और बांग्लादेश है। पाकिस्तान पान का प्रमुख आयातक है।

वर्गीकरण विज्ञान

कुल : पिपरऐसी, आर्डर : पिपरलेसी

प्रजातियां : पी. बीटल

वितरण : पान एक सदाबहार व्यापक रूप से बढऩे वाली लता है। इसका वाणिज्यिक उत्पाद पत्तियां है जो मुख्य रूप से सुपारी, बुझे चूने, तंबाकू और कुछ अन्य साम्रगी के साथ चबाने के लिए उपयोग की जाती है। पान चबाने की आदत 340 ई.पू. पुरानी है। और उस समय पान एक प्रतिष्ठित देश के प्रतिष्ठित समाज के द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तु थी। वर्तमान में पान स्थानीय खपत और निर्यात के लिए पैदा किया जा रहा है। पान के प्रमुख उत्पादक देश भारत, श्रीलंका, थाईलैंड और बांग्लादेश है। पाकिस्तान पान का प्रमुख आयातक है।

वाह्य स्वरूप

स्वरूप : पान एक सदाबहार और बारहमासी लता है। इसका तना अद्र्ध लकड़ीदार होता है।

पत्तिंया : पत्तियां साधारण एक दूसरे की ओर, ह्दयाकार और चमकीले हरे रंग की होती है। पत्तियां 4 से 9 इंच लंबी और 2 से 4 इंच चौड़ी होती है।

फूल : नर फूल डंठल 3 से 6 इंच लंबे और मादा फूल डंठल 0.7 से 31/2 इंच लंबे होते है।

फल : फल डंठल 1 से 5 इंच लंबे होते है।

परिपक्व ऊंचाई : यह लता 10-15 फीट तक की ऊंचाई तक बढ़ती है।

बुवाई का समय

जलवायु : पान को उच्च वातावरण में नमी के साथ उष्णकटिबंधीय जलवायु की आवश्यकता होती है लेकिन यह सूखी की स्थिति को भी सहन कर सकता है। इसकी खेती ऊपरी भूभाग के साथ – साथ अद्र्ध भागों में भी की जा सकती है। 200 से 450 से.मी. तक वार्षिक वर्षा आदर्श मानी जाती है। फसल कम से कम 10 डिग्री सेल्सियस का तापमान और 40 डिग्री सेल्सियस से अधिकतम तापमान को भी सहन कर सकती है।

भूमि : पान को उच्च भूमि की आवश्यकता होती है और विशेष रूप से अच्छी तरह से सूखी मिट्टी पर सर्वोत्तम होती है। इसकी पैदावार लेटरिक मिट्टी में भी अच्छी तरह होती है। पान को लगातार नम मिट्टी की जरूरत होती है लेकिन मिट्टी में अत्यधिक नमी नहीं होना चाहिए। जल भराव, खारी और क्षारीय मिट्टी इसकी खेती के लिए अनुपयुक्त होती है।

मौसम: मई – जून माह में इसे लगाया जाता है।

बुवाई-विधि

भूमि की तैयारी :- खेत को बांस की लकडिय़ों और नारियल के पत्तों के साथ घेराबंदी की जाती है। भूमि को अच्छी तरह से खोदा जाता है। मिट्टी में हल से 1000 से 1500 से.मी. लंबाई, 75 से.मी. चौड़ाई और 75 से.मी. गहराई की लकीरें खीची जाती है। खली, खाद और पत्तियां को ऊपरी मिट्टी में अच्छी तरह मिलाकर लकीरों के ऊपर डाला जाता है। लता कलमों को मई और जून माह में लगाया जाता है। पौधों को लगभग दो फीट की दूरी पर समानांतर पंक्तियों में लगाया जाता है।

फसल पद्धति विवरण

परिपक्व लताओं (2-3 साल की) के शीर्ष भाग का उपयोग रोपण के लिए किया जाता है। तीन नोड्रस वाली लगभग 1 मी. लंबी स्वस्थ्य कलमों का उपयोग रोपण के लिए किया जाता है। एक हेक्टेयर में रोपण के लिए 20,000 – 25,000 कलमों की आवश्यकता होती है। रोपण के दौरान एक नोड मिट्टी के अंदर होना चाहिए और दूसरा नोड जमीनी स्तर पर होना चाहिए। शीघ्र अंकुरण को प्रोत्साहित करने के लिए रोपित कलम के चारों ओर मिट्टी को दृढ़ता से दवा देना चाहिए। अतिरिक्त नमी को रोकने के लिए मिट्टी में प्रारंभिक दौर में हाथ से पानी के छीटें डालना चाहिए। बारिश की अनुपस्थिति में पूर्ण स्थापन तक पौधों की हल्की सिंचाई और प्रतिदिन चार बार सिंचाई करना चाहिए।

पौधशाला

नर्सरी बिछौना-तैयारी: प्राय: पान को जलमग्न क्यारियों में बोया जाता है। क्षेत्र समतल, अच्छी जल निकसी और अच्छी रोशनी के साथ होना चाहिए। क्षेत्र कम से कम 2 साल से बैक्टीरिया, पर्ण अंगमारी रोग से संक्रमित नहीं होना चाहिए। भूमि की तैयारी के बाद 1.2 – 7.5 मी. की क्यारियां तैयार की जाती है। क्यारियों का आकार स्थान की उपलब्धता के साथ बढ़ाया जा सकता है। क्यारियों में खूंटी 45-45 से.मी. की दूरी में सहारा देने के लिए लगाई जाती है। एक खूंटी (छड़ी) के समीप दो कलमों को लगाया जाता है। क्यारियों की दिन में एक या दो बार सिंचाई की जाती है।

कीट प्रबंधन

कीट : लेपीडोसोपल और सुडोकोकस (फुसपुसा कीड़ा)

पहचान : यह कीड़ा तने में लगता है।

नियंत्रण : इसे 0.25′ कुनालफास का छिड़काव करके नियंत्रित किया जा सकता है।

रोग प्रबंधन

रोग : – (पर्ण चित्ती)

लक्षण :- प्रारंभिक लक्षण पान में छोटे – छोटे पानी में भीगे धब्बे के रूप में दिखाई देते है, जो बाद में बढ़कर गहरे भूरे रंग के हो जाते एंव केन्द्र में पीले आभा मंडल जैसे दिखते हैं।

कारणात्मक जीव : जेन्थोमोनस बेटलीकोला

नियंत्रण : इसे नियंत्रित करने के लिए 1′ बेर्डेकस के मिश्रण का छिड़काव किया जाता है।

उत्पादन प्रौद्योगिकी खेती

खाद : प्रत्येक तुड़ाई के बाद खाद देना चाहिए। पाक्षिक अंतराल में सूखी पत्तियों और लकड़ी की राख क्यारियों में डालना चाहिए एवं गोबर के घोल का छिड़काव करना चाहिए। इस प्रक्रिया को चार महीने तक दोहराया जाता है जब तक फसल कटाई के लिए तैयार न हो जाये। 195 ग्रा. यूरिया, 65 ग्रा. ट्रिपल सुपर फास्फेट और 100 ग्रा. पोटाश के दाने देना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन : इस फसल की सफल खेती के लिए सिंचाई की आवश्यकता होती है। सिंचाई नित्य और हल्की की जाती है और क्यारियों में आधे घंटे से ज्यादा पानी का जमाव नहीं होना चाहिए। गर्म महीनों के समय में पौधों की नियमित रूप से सिंचाई करना चाहिए। यदि भारी बारिश या अतिरिक्त सिंचाई द्वारा पानी प्रवेश होता है तो तुरंत जल निकासी की व्यवस्था करना चाहिए। सिंचाई के लिए सबसे अच्छा समय सुबह या शाम होता है।

घसपात नियंत्रण प्रबंधन: खरपतवार की निंदाई करके स्थान को स्वच्छ रखना चाहिए।

संरक्षित-खेती

कटाई: एक वर्ष के बाद पत्तियां तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। प्रारंभ में मुख्य तने के निचले भाग से परिपक्व पत्तियों को तोड़ा जाता है। बाद में मुख्य तने और पाववीय तने से पत्तियों की तुड़ाई की जाती है। एक बार जब तुड़ाई शुरू हो जाती है तो सामान्यत: प्रत्येक दिन या प्रत्येक सप्ताह चालू रहती है।

फसल काटने के बाद और मूल्य परिवर्धन

पैकिंग : बाजार भेजने के पहले तोड़े गये पान के पत्तों की गड्डी बनायी जाती है, प्रत्येक गड्डी में 40 पत्तियां होती है। गड्डियों को निर्यात बाजार के लिए विशेष रूप से तैयार बांस की टोकरीयों में पैक किया जाता है।

भडांरण:  पान को शुष्क स्थानों में संग्रहित करना चाहिए। गोदाम भंडारण के लिए आदर्श होते है। शीत भंडारण पान के लिए अच्छे होते है।

परिवहन : सामान्यत: किसान अपने उत्पाद को बैलगाड़ी या टै्रक्टर से बाजार तक पहुंचता हैं। दूरी अधिक होने पर उत्पाद को ट्रक या लांरियों के द्वारा बाजार तक पहुंचाया जाता हैं। परिवहन के दौरान चढ़ाते एवं उतारते समय पैकिंग अच्छी होने से फसल खराब नहीं होती हैं।

अन्य-मूल्य परिवर्धन: तेल, पान मासाला, मुख शुद्धि

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